धनंजय सिंह।विश्व भू-राजनीति के प्रचंड दबाव और कोविड महामारी के दौरान आपूर्ति व्यवस्था में आए व्यवधान की कठिन चुनौती से निपटने में लगा है। विश्व को झकझोर देने वाली इन समस्याओं की जटिलता रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ और बढ़ गई थी और अब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के कारण बेहद गंभीर हो गई है।प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय व्यापार नीतियों में एकतरफा बदलाव सबसे अहम घटना रही है।इन अर्थव्यवस्थाओं द्वारा व्यापार के तरीकों के इस्तेमाल में पुराने बहुपक्षीय व्यापार सिद्धांतों से भटकाव साफ दिखाई दे रहा है।
निष्क्रिय हो चुके विवाद निपटान तंत्र (डीएसएम) ने निस्संदेह इस रुझान को और हवा दे दी है,लेकिन संस्थागत स्तर पर चुप्पी से भी कोई मदद नहीं मिली है। हैरान करने वाली बात है कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में मंत्री-स्तरीय सम्मेलन बिना किसी ठोस नतीजे के भी होते रहते हैं। बहुपक्षीय प्रणाली में सुधार और उसे बनाए रखने की बात राष्ट्रीय सुधार प्रस्तावों के जरिये आगे बढ़ाई जा रही है।
ये प्रस्ताव पुरानी उदार वैश्विक व्यापार प्रणाली के मूल सिद्धांत (जैसे समानता और निष्पक्षता) बनाए रखने के बजाय राष्ट्रीय व्यापार नीतियों में उभरते अंतर और दोहरे मानदंडों के हिसाब से वैश्विक व्यापार के नियम फिर तय करने पर अधिक केंद्रित हैं। इस संदर्भ में वर्तमान में वैश्विक व्यापार में कुछ प्रमुख देशों की व्यापार नीतियों के अहम पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है।
अमेरिका इस व्यापार नीति के दोहरे मानदंड का साफ उदाहरण है।हालांकि डीएसएम की अपील संस्था में न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय ही शुरू हुई थी मगर बाद में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने डब्ल्यूटीओ के आम सहमति के सिद्धांत का इस्तेमाल कर इस प्रणाली को बेकार कर दिया।इसका नतीजा यह हुआ कि बाध्य शुल्क पर डब्ल्यूटीओ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद अमेरिका ने अपने सभी व्यापारिक साझेदारों (जिनमें पुराने सहयोगी भी शामिल हैं) पर भेदभावपूर्ण शुल्क (बदले की कार्रवाई और एक तरह से सजा के तौर पर) एकतरफा रूप से लगाना जारी रखा है।
पिछले वर्ष अमेरिका द्वारा किए गए व्यापार समझौते मुख्य रूप से लेनदेन पर आधारित थे और उनका मकसद साझेदार अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डालकर उन्हें अपनी बात मानने के लिए विवश करना था,जिससे वह अपने राजनीतिक और आर्थिक मकसद पूरे कर सके। ये समझौते मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के संदर्भ में शुल्क और व्यापार पर सामान्य समझौता (जीएटीटी) की धारा 24 का स्पष्ट उल्लंघन थे।
आश्चर्य की बात है कि अमेरिका के सभी अनुचित और जरूरत से अधिक शुल्कों को अमेरिकी व्यापार विशेषज्ञों ने पारस्परिकता के सिद्धांतों के आधार पर सही ठहराया है। हम जानते हैं कि यह किसी भी निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय बातचीत का एक बुनियादी सिद्धांत है।इसके अलावा सभी नियमों के उल्लंघन के बावजूद अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ से नाता नहीं तोड़ा है,जैसा उसने कुछ अन्य बहुपक्षीय संगठनों से बाहर निकल कर किया था।
वास्तव में अमेरिका ने न केवल उन बहुपक्षीय संगठनों की सूची से डब्ल्यूटीओ को बाहर रखा है,जिनके लिए उसने योगदान बंद करने का फैसला किया था बल्कि अक्टूबर 2025 में उसने डब्ल्यूटीओ को अपनी बकाया सदस्यता फीस के तौर पर 2.5 करोड़ डॉलर का भुगतान भी किया। यह भुगतान पिछले दो वर्षों से फीस रोकने के बाद किया गया था।
पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय संघ (ईयू) की व्यापार नीति में भी विरोधाभास देखने को मिला है। एक ओर ईयू ने डब्ल्यूटीओ में शिकायत दर्ज कराई है तो वहीं दूसरी ओर उसने अमेरिका पर कोई जवाबी शुल्क नहीं लगाया है। इसके बजाय अमेरिका के साथ अपने संबंधों को संभालने की कोशिश में उसने शुल्कों के स्तर और किए गए निवेश दोनों ही मामलों में अमेरिका के अनुकूल शर्तों पर एक व्यापार समझौता किया है।
ईयू ने अपने नुकसान की भरपाई के लिए पिछले दो वर्षों में भारत,इंडोनेशिया और मर्कोसुर(दक्षिण अमेरिका का प्रमुख राजनीतिक एवं व्यापार संघ) सहित कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते करने में उल्लेखनीय तत्परता और लचीलापन दिखाया है। दिलचस्प बात यह है कि ईयू अपने व्यापारिक साझेदारों के हित ध्यान में रखते हुए अब अपने पहले के उच्च-मानक वाले एफटीए से काफी हट गया है। कोरिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ पहले हुए एफटीए (जिनमें नियमों का पालन न करने पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान था) अब पुरानी बात हो गई है।
हालांकि साथ ही साथ ईयू एकतरफा और भेदभावपूर्ण व्यापारिक तरीकों का भी तेजी से इस्तेमाल कर रहा है। उदाहरण के लिए कार्बन सीमा समायोजन ढांचा (सीबीएएम) में कोई रियायती प्रावधान नहीं है जैसा डब्ल्यूटीओ के ‘विशेष और विभेदक उपचार’ (एसऐंडडीटी) प्रावधानों के तहत कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं के मामले में होता है।
इसके अलावा चीन में तेजी से हो रहे नवाचार और अपनी औद्योगिक सुस्ती को लेकर चिंतित यूरोपीय आयोग ने मार्च 2026 में इंडस्ट्रियल एक्सेलेरेटर ऐक्ट का प्रस्ताव रखा। मुख्य रूप से पूरे ईयू में क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने के उद्देश्य से लाया गया यह कानून भेदभावपूर्ण है क्योंकि यह गैर-एफटीए साझेदारों से आयातित कच्चे माल या पुर्जे मंगाना सीमित करता है। यह कानून अमेरिका के मुद्रास्फीति नियंत्रण अधिनियम, 2022 जैसे प्रावधानों पर आधारित है।
चीन (जिसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार और मौजूदा भू-राजनीति के लिए भी बहुत अहम है) के लिए दोहरी व्यापार नीति कोई नई बात नहीं है। हालांकि हाल के समय में उसके दोहरे मानदंड का एक और पहलू भी सामने आया है क्योंकि चीन स्वयं को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है।
भले ही चीन अक्सर वैश्विक मूल्य श्रृंखला में अपनी अहम भूमिका का इस्तेमाल हथियार की तरह करता है और दुनिया में जरूरत से अधिक क्षमता की चुनौती के केंद्र में रहता है मगर उसने घोषणा की है कि वह डब्ल्यूटीओ में भविष्य में व्यापार पर बातचीत और समझौतों में एसऐंडडीटी प्रावधानों के फायदे नहीं लेगा। चीन ने इस वर्ष की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें स्थिर करने में भी मदद की। वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में कच्चा तेल का आयात कम कर उनसे ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद शुरू संकट के बीच अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की।
हालांकि वैश्विक व्यापार नीति के इस दोहरे मानदंड के ढर्रे में दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) एक अपवाद रहा है। आसियान अर्थव्यवस्थाओं ने नियम आधारित व्यापार का पालन करना जारी रखा है और उच्च मानक एफटीए और व्यापक-क्षेत्रीय व्यापार समझौतों जैसे क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) और प्रशांत पार साझेदारी के लिए व्यापक एवं प्रगतिशील समझौता (सीपीटीपीपी) में अपनी भागीदारी बढ़ाई है। ऐसा तब है जब आसियान की अर्थव्यवस्थाएं अपने घरेलू उद्योगों के कमजोर होने और नौकरियों में कमी से जूझ रही हैं।
उनको यह नुकसान चीन से कम कीमतों पर अत्यधिक आपूर्ति के असर और अमेरिका द्वारा अत्यधिक जांच और उसके बाद अधिक ट्रांसशिपमेंट टैरिफ लगाने के कारण हुआ है। ट्रांसशिपमेंट टैरिफ का संबंध उस कर या शुल्क से है जो किसी माल को सीधे उसके मूल देश से अंतिम गंतव्य तक भेजने के बजाय किसी तीसरे देश के रास्ते भेजने पर लगाया जाता है।
चीन प्लस 1 यानी चीन के अलावा दूसरे देशों में विनिर्माण एवं आपूर्ति श्रृंखला स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में भारत की व्यापार नीति ने अहमियत दर्ज की है। भारत ने अपनी हाल में एफटीए पर हुई बातचीत में अधिक उदार व्यापार नीति की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए हैं।
अमेरिका द्वारा ऊंचे शुल्क (जिसमें रूसी तेल की खरीद पर दंडात्मक टैरिफ भी शामिल हैं) लगाने के लगातार दबाव का सामना करते हुए भारत ने तेजी से बाजार में विविधता लाने की ओर कदम बढ़ाया है और पिछले एक वर्ष में ब्रिटेन और ईयू जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ एफटीए पर बातचीत पूरी की है। साथ ही, भारत का संरक्षणवादी रुख भी बरकरार है। भारत के विनिर्माण क्षेत्र में औसत ‘सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र’ (एमएफएन) शुल्क (जो 1990 या 2000 के दशक की शुरुआत में भी आसियान शुल्क से अधिक थे) पिछले दशक में और बढ़ गए हैं।
हाल की बहुपक्षीय बातचीत में भी भारत ने रक्षात्मक रुख अपनाया है। लिहाजा इसमें कोई शक नहीं कि इस समय राष्ट्रीय व्यापार नीतियां दोराहे पर खड़ी हैं। लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच 80 वर्ष पुराने बहुपक्षीय व्यापार ढांचे को फिर मजबूत करने की उम्मीद कम ही नजर आती है। हालांकि, यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि उभरते हुए ‘राष्ट्रवादी’ रुझान परस्पर जुड़ी हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था को किस तरह बदलेंगे।