खाद्य तेलों का बढ़ा आयात,आत्मनिर्भरता की राह में तकनीक नहीं नीतियां बन रहीं रोड़ा


खाद्य तेलों का बढ़ा आयात,आत्मनिर्भरता की राह में तकनीक नहीं नीतियां बन रहीं रोड़ा

मनोज बिसारिया | 24 Aug 2026

 

नई दिल्ली।वनस्पति तेल उद्योग के आकलन के मुताबिक चालू तेल वर्ष (नवंबर से अक्टूबर) में लगभग 1.75 लाख करोड़ रुपये तक के खाद्य तेलों का आयात हो सकता है।तेल आयात पर इतना खर्च कभी नहीं हुआ और पिछले साल के 1.61 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड से भी यह लगभग 9 फीसदी ज्यादा रहेगा।आयात पर खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण देश में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग और उत्पादन के बीच बढ़ता अंतर है।

मिडिल ईस्ट संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने, इंडोनेशिया में जैव ईंधन के कारण पाम ऑयल की उपलब्धता घटने और रुपया गिरने से भी आयात का खर्च बढ़ा है।खाद्य तेलों के आयात में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने निकट भविष्य में खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लक्ष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

देश में तिलहन का उत्पादन लगातार बढ़ने के बाद भी आयात में बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि आपूर्ति की तुलना में मांग ज्यादा तेजी से बढ़ रही है।पिछले कई दशकों में इस समस्या को दूर करने के लिए कई प्रयास किए गए,लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।आज भी देश में खाद्य तेल की आधी से अधिक जरूरत आयात के जरिये पूरी होती है।

खाद्य तेल जैसी आम जरूरत की वस्तु के लिए आयात पर इतना निर्भर रहना सही नहीं है।स्थिति चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि भारत पाम ऑयल और उससे जुड़े उत्पादों का सबसे ज्यादा आयात करता है,जिन्हें मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से खरीदा जाता है।इन देशों से आपूर्ति में किसी भी कारण से रुकावट आई तो खाद्य तेल के सबसे बड़े आयातक भारत के लिए गंभीर समस्या खड़ी हो सकती है। वनस्पति तेल ऐसी वस्तु भी नहीं है,जिसका पर्याप्त उत्पादन देश में नहीं किया जा सकता।

भारतीय कृषि वैज्ञानिक देश को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी तकनीक पहले ही तैयार कर चुके हैं। अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए तिलहन फसलों की 1,000 से अधिक उन्नत किस्में और संकर बीज विकसित किए जा चुके हैं।तिलहन फसलों की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 1950 के दशक में केवल 4.8 क्विंटल थी,जो इन किस्मों की वजह से बढ़कर अब लगभग 14 क्विंटल हो गई है।फिर भी औसत राष्ट्रीय उपज और नई उन्नत किस्मों की संभावित उपज के बीच काफी अंतर है।नई किस्मों से प्रति हेक्टेयर 20 से 25 क्विंटल तक फसल उगाई जा सकती है। यह खाई पूरी तरह या काफी हद तक पाट दी गई तो खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है।

इसके लिए कृषि मूल्य निर्धारण नीतियां भी बदलनी होंगी। तिलहन की खेती किसानों के लिए दूसरी फसलों जितनी लाभदायक बनेगी तभी वे इसका रकबा बढ़ाने,उन्नत बीज और कृषि के नए तरीके अपनाने और सिंचाई,उर्वरक और पौधों को संरक्षण देने वाले रसायन जैसी पैदावार बढ़ाने वाली सुविधाओं में निवेश करेंगे।मूल्य निर्धारण और सरकारी खरीद की मौजूदा नीतियों से किसानों को अच्छी और उपजाऊ भूमि पर ज्यादा मुनाफा देने वाली खाद्य और व्यावसायिक फसलें उगाने का प्रोत्साहन मिलता है।इसलिए तिलहन की खेती के लिए कम उपजाऊ और सिंचाई की सुविधा से रहित जमीन रह जाती है। वास्तव में तिलहन की खेती का लगभग 75 प्रतिशत रकबा अब भी सिंचाई की सुविधा से वंचित है।

सौभाग्य से वनस्पति तेलों में जैसी विविधता भारत में है वैसी दुनिया में कहीं भी नहीं है।मूंगफली,सरसों-राई और सोयाबीन सहित नौ प्रमुख तिलहन फसलों के अलावा नारियल और ऑयल पाम जैसी बारहमासी फसलें भी हैं।साथ ही मुख्य रूप से आदिवासी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली कुछ फसलें भी हैं, जिनमें तिलहन के पेड़ होते हैं।बिनौले यानी कॉटनसीड और चावल की भूसी जैसे अपारंपिक स्रोतों से भी तेल का उत्पादन बढ़ाने की काफी गुंजाइश है,जो भारत में बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ तेल तो पाम ऑयल से ज्यादा सेहतमंद होते हैं।

खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए संगठित प्रयास 1980 के दशक के मध्य में शुरू हुए,जब 1986 में तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन की स्थापना की गई।इस मिशन के प्रयासों से 1990 के दशक की शुरुआत तक देश में तिलहन का उत्पादन बढ़कर घरेलू जरूरत के काफी करीब पहुंच गया था। इस सफलता की मुख्य वजह देसी बाजार में कीमतों को एक दायरे में घटने-बढ़ने देना था। इससे उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित बने रहे। सरकार तभी हस्तक्षेप करती थी जब देसी बाजार में दाम उस दायरे को लांघने लगते। ऐसे मौकों पर आयात शुल्क बढ़ाया या घटाया जाता था।

इस दौर को पीली क्रांति कहा गया मगर यह ज्यादा समय तक नहीं रहा।इसकी बड़ी वजह यह थी कि तिलहन तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन को कीमतों,आयात और निर्यात से जुड़े फैसले लेने की जो भरपूर आजादी शुरुआत में दी गई थी वह धीरे-धीरे कम कर दी गई।इसके अलावा मिशन पर दलहन और मक्का समेत दूसरी फसलों को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी भी लाद दी गई। 1990 के दशक के मध्य तक इस मिशन का रुतबा घटाकर इसे तिहलन,दलहन,ऑयल पाम और मक्के को बढ़ावा देने की व्यापक योजना बना दिया गया। जाहिर है कि इन फसलों को उस तरह का खास और लगातार ध्यान नहीं मिल सका,जो उनके विकास के लिए जरूरी था। इसके बाद तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन के कई नए रूप सामने आए,लेकिन पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकार न मिलने के कारण उनमें से कोई भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका।

इस तरह खाद्य तेल क्षेत्र की असली समस्या तकनीक की कमी नहीं बल्कि कृषि मूल्य निर्धारण और खरीद की गलत नीतियां हैं।तिलहन की खेती को आर्थिक रूप से इतना लाभकारी बनाना जरूरी है कि किसान इसे दूसरी फसलों के मुकाबले कम आकर्षक न समझें। जब तक तिलहन की खेती का आर्थिक गणित नहीं सुधरेगा तब तक खाद्य तेलों के आयात पर भारत की निर्भरता कम होती नहीं दिखती।


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