नई दिल्ली।बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कथित गड़बड़ी वाले कारोबार के महज 6 दिन के भीतर जेपी मॉर्गन चेस की एक यूनिट और एक घरेलू ब्रोकरेज कंपनी के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किया है। बाजार के जानकार इस तेज कार्रवाई को नए क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम में हेरफेर की कोशिश करने वाले ट्रेडर्स के लिए बड़ी चेतावनी मान रहे हैं।
सेबी ने जेपी मॉर्गन की यूनिट कॉप्थॉल मॉरीशस इन्वेस्टमेंट लिमिटेड और मानसी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड को पूंजी बाजार में कारोबार करने से रोक दिया है। दोनों पर 13 अगस्त को क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान कथित रूप से गड़बड़ी वाले सौदे करने का आरोप है।बाजार नियामक ने कथित गतिविधि के 6 दिन के भीतर कार्रवाई की।यह पुराने मामलों के मुकाबले काफी तेज है, जिनकी जांच और आदेश जारी करने में कई बार वर्षों लग जाते थे।
सेबी के मुताबिक दोनों संस्थाओं ने कथित तौर पर करीब 3.7 करोड़ रुपये का संयुक्त अनुचित लाभ कमाया।नियामक ने कहा कि यह रकम जमा करने के बाद दोनों पर लगा कारोबारी प्रतिबंध हटाया जा सकता है।
सेबी बोर्ड के सदस्य कमलेश वार्ष्णेय की ओर से बुधवार देर रात जारी 46 पन्नों के आदेश में आरोप लगाया गया कि कॉप्थॉल और मानसी शेयर ने क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान ऐसे सौदे किए,जिनसे बीएसई सेंसेक्स के संकेतक संतुलन मूल्य को प्रभावित किया गया।
सेबी ने कहा कि इससे सेंसेक्स से जुड़े उनके विकल्प सौदों को फायदा पहुंचा।हालांकि यह अंतरिम आदेश है और आरोपों पर आगे की नियामकीय प्रक्रिया अभी जारी रह सकती है।सेबी ने अपने आदेश में कहा कि दोनों संस्थाओं ने क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान तय मूल्य सीमा के ऊपरी स्तर के पास बड़ी मात्रा में ऑर्डर लगाए। बाद में इन ऑर्डर का बड़ा हिस्सा रद्द कर दिया गया।
नियामक के मुताबिक ये ऑर्डर पूरी तरह पूरे नहीं हुए,लेकिन उन्होंने शेयरों के संकेतक बंद भाव को प्रभावित किया।इस तरह की गतिविधि को ऑर्डर स्पूफिंग कहा जाता है। इसमें कारोबारी बाजार में मांग या आपूर्ति का गलत संकेत देने के लिए बड़े ऑर्डर लगाता है और सौदा पूरा होने से पहले उन्हें वापस ले लेता है।
बता दें कि क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम में बाजार बंद होने से पहले एक तय समय के दौरान खरीद और बिक्री के ऑर्डर एकत्र किए जाते हैं। इन ऑर्डर के आधार पर शेयरों का अंतिम बंद भाव तय होता है।इस व्यवस्था का उद्देश्य दिन के अंतिम कुछ मिनटों में होने वाले अचानक उतार-चढ़ाव को कम करना और बंद भाव तय करने की प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाना है।सेबी ने भारतीय बाजार को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने के लिए इस व्यवस्था की शुरुआत की है।हालांकि लागू होने के शुरुआती हफ्तों में इस व्यवस्था को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।क्लोजिंग सत्र के दौरान शेयर सूचकांकों में अचानक उछाल और कम नकदी को लेकर ट्रेडर्स ने सवाल उठाए थे।सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे पहले ही साफ कर चुके हैं कि नई व्यवस्था जारी रहेगी। हालांकि नियामक जरूरत के अनुसार इसमें सुधार करने के लिए तैयार है।
बाजार जानकारों के मुताबिक क्लोजिंग ऑक्शन की बनावट के कारण संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करना आसान हो सकता है।पुरानी व्यवस्था में नियामक को लगातार चलने वाले कारोबारी सत्र के दौरान बंद भाव प्रभावित करने की कोशिशों की जांच करनी पड़ती थी।नई व्यवस्था में निगरानी एक सीमित ऑक्शन अवधि पर केंद्रित रहती है।इसमें यह देखा जा सकता है कि ऑर्डर कब लगाया गया,उसमें कब बदलाव हुआ और उसे कब रद्द किया गया।इससे संकेतक संतुलन मूल्य को प्रभावित करने की कोशिशों का पता जल्दी लगाया जा सकता है।
जानकारों का मानना है कि सेबी की तेज कार्रवाई में जेन स्ट्रीट समूह से जुड़े पुराने मामले से मिले अनुभव की भी भूमिका हो सकती है। उस मामले में नियामक ने कार्रवाई से एक साल से अधिक समय पहले जांच शुरू की थी।जेन स्ट्रीट ने अपने खिलाफ लगे सभी आरोपों से इनकार किया है और अतिरिक्त दस्तावेजों तक पहुंच के लिए भारतीय अदालत में अपील की है।
बता दें कि कॉप्थॉल मॉरीशस,जेपी मॉर्गन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से अलग संस्था है।जेपी मॉर्गन इंडिया सेबी के पास शेयर ब्रोकर और मर्चेंट बैंकर के रूप में पंजीकृत है।इसलिए कॉप्थॉल पर हुई कार्रवाई का भारत में स्थानीय इकाई के जरिये चलने वाली जेपी मॉर्गन की गतिविधियों पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक बाजार भागीदारों को नई व्यवस्था के अनुरूप पूरी तरह ढलने में करीब एक महीने का समय लग सकता है। सेबी की ताजा कार्रवाई यह संकेत देती है कि क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम जारी रहेगा और इसमें गड़बड़ी की कोशिशों पर नियामक तेजी से कदम उठा सकता है।