नई दिल्ली।भारत में गूगल अपना एक बहुत बड़ा डेटा सेंटर बनाने की तैयारी कर रहा है,इसमें 15 अरब डॉलर का निवेश होना है।इसके लिए आंध्र प्रदेश में पहाड़ियों को काटकर उन्हें सीढ़ीदार बनाया जा रहा है ताकि काम शुरू हो सके,लेकिन अब इस प्रोजेक्ट को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे आसपास के जंगल और वन्यजीवों को नुकसान होगा और भारी मात्रा में पानी की खपत से इलाके में पानी का संकट पैदा हो सकता है।इसी विरोध के चलते गूगल का यह बड़ा प्रोजेक्ट अब कानूनी मुश्किलों में फंस गया है।
पानी की सप्लाई पर पड़ने वाले असर
आंध्र प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सहयोगी की सरकार है और जिन्होंने इस प्रोजेक्ट को ऐतिहासिक और बदलाव लाने वाला बताया है,इसने उन आरोपों को खारिज कर दिया है कि पानी की सप्लाई और वन्यजीवों पर पड़ने वाले जोखिमों को परखे बिना ही इस प्रोजेक्ट को तेज़ी से आगे बढ़ाया गया।बढ़ता विरोध गूगल के भारत में अब तक के सबसे बड़े निवेश के लिए एक शुरुआती परीक्षा बन सकता है। इस निवेश को पानी की सप्लाई पर पड़ने वाले असर और एक वन्यजीव अभयारण्य के पास होने की वजह से कई कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।सोशल मीडिया पोस्ट से पता चलता है कि हाल के हफ़्तों में विशाखापत्तनम शहर में एक्टिविस्ट और बच्चों ने मार्च निकाला है,वे ऐसे बैनर पकड़े हुए थे जिन पर लिखा था हम डेटा नहीं पी सकते और गूगल के लोगो पर हथकड़ी की तस्वीर बनाई थी।
रविवार को रॉयटर्स एक जनसभा में शामिल हुआ
रविवार को रॉयटर्स एक जनसभा में शामिल हुआ,जहां एक्टिविस्ट ने आने वाले दिनों में घर-घर जाकर जागरूकता अभियान चलाने और बीच पर विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई।विकास लोगों की आजीविका की कीमत पर नहीं होना चाहिए गैर-लाभकारी संस्था ग्रीन विशाखा के संस्थापक राजा राम मोहन रॉय ने एक कार्यक्रम में कहा। इस कार्यक्रम में राॅय ने विशाखापत्तनम में पानी की मांग और आपूर्ति पर दबाव से जुड़े आंकड़े पेश किए।
जानें सरकार का क्या कहना है
सरकार का कहना है कि शहर को अपने जलाशयों और नदियों से रोज़ाना 410 मिलियन लीटर पानी मिलता है, जबकि 480 मिलियन लीटर की जरूरत है। 25 लाख की आबादी वाले इस शहर में पानी की राशनिंग आम बात है। विश्व भर में तेज़ी से बन रहे डेटा सेंटरों का विरोध हो रहा है, क्योंकि इनमें सर्वर को ठंडा रखने के लिए बहुत ज़्यादा पानी और बिजली का इस्तेमाल होता है।भारत जैसे विकासशील देश में इसका असर और भी ज़्यादा हो सकता है।अमेरिका में जुलाई में 42 राज्यों में विरोध करने वालों ने इसी तरह की चिंताएं जताते हुए 142 विरोध प्रदर्शन किए।
राज्य ने अपना पक्ष रखा,समाधान के लिए तैयार
राज्य की सबसे बड़ी अदालत ने सोमवार को सरकार से जल बिरादरी नाम के एक्टिविस्ट ग्रुप के आरोपों का जवाब देने को कहा। इस ग्रुप का कहना है कि इस प्रोजेक्ट से पास के जलाशय पर दबाव पड़ेगा और पानी की उपलब्धता पर असर पड़ेगा। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट अब 24 अगस्त को इस जनहित याचिका पर सुनवाई करेगा।राज्य सरकार ने रॉयटर्स को दिए बयान में कहा कि प्रोजेक्ट को लेकर एक्टिविस्ट की चिंताएं गलत और गुमराह करने वाली हैं,लेकिन साथ ही यह भी कहा कि वे फीडबैक के लिए तैयार हैं।
सरकार ने कहा,इस तरह के विरोध-प्रदर्शन उनका लोकतांत्रिक अधिकार
सरकार ने कहा,इस तरह के विरोध-प्रदर्शन उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।अगर इनमें से कोई भी दावा सही पाया जाता है तो सरकार बातचीत करने और तथ्यों के आधार पर सफाई देने और उचित समाधान निकालने के लिए तैयार है।गूगल ने रॉयटर्स को दिए बयान में कहा कि उसका प्रोजेक्ट लागू कानूनों के मुताबिक विकसित किया जाएगा और वह स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए एडवांस्ड एयर कूलिंग तकनीक का इस्तेमाल करेगा।जब रॉयटर्स की टीम ने सोमवार को वहां का दौरा किया तो काम ज़ोरों पर था और अर्थमूवर्स खुली ज़मीन पर काम कर रहे थे। बता दें कि इस टेक कंपनी ने भारतीय अरबपति गौतम अडानी के ग्रुप के साथ साझेदारी की है,जो इस बड़े प्रोजेक्ट को बनाएगा। माना जा रहा है कि इससे 1,88,000 तक नौकरियां पैदा होंगी।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका में यह चिंता भी जताई गई है कि बड़े पैमाने पर हो रहे निर्माण कार्य और शोर-शराबे का असर सिर्फ़ 860 मीटर दूर स्थित कंबलाकोंडा वन्यजीव अभयारण्य पर पड़ सकता है।जब अभयारण्य से साइट की नज़दीकी के बारे में पूछा गया तो राज्य सरकार ने कहा कि यह दूरी कानून में तय सीमा से ज़्यादा है।गूगल ने कहा कि वह शोर कम करने के उपाय करेगा ताकि यह पक्का किया जा सके कि “हम एक शांत और बिना किसी को परेशान करने वाले पड़ोसी की तरह रहें।
इस प्रोजेक्ट के खिलाफ़ भारत की पर्यावरण अदालत में ‘ह्यूमन राइट्स फ़ोरम’ ने तीन और मामले भी दायर किए हैं, जिनमें काम रोकने की मांग की गई है। कोर्ट के दस्तावेज़ों के मुताबिक, उनका तर्क है कि राज्य सरकार ने ग्रामीण पेयजल योजना से पानी लेने के असर का ठीक से आकलन किए बिना ही इस प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दे दी।राज्य सरकार ने यह भी कहा कि आने वाले डेटा सेंटर्स के लिए ग्रामीण इस्तेमाल वाला पानी नहीं लिया जाएगा और न ही पास के जलाशय का पानी इस्तेमाल किया जाएगा।
रविवार को हुए एक कार्यक्रम में ‘ग्रीन विशाखा’ ने कहा कि उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार के 20 साल तक “गारंटीड” पानी की सप्लाई के वादे को लेकर चिंता है, क्योंकि शहर में पहले से ही पानी की कमी है।