नई दिल्ली।इक्रा की इस सप्ताह प्रकाशित एक नई रिपोर्ट ने राज्य सरकारों की वित्तीय कमजोरी को रेखांकित किया है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकारों द्वारा जारी प्रतिभूतियों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा वित्त वर्ष 2027-28 से लेकर वित्त वर्ष 2031-32 के बीच परिपक्व हो जाएगा।इनकी कुल राशि लगभग 24 लाख करोड़ रुपये होगी। मार्च 2026 के अंत तक राज्य सरकारों की कुल बकाया प्रतिभूतियां लगभग 73 लाख करोड़ रुपये थीं।
राज्य सरकारों को परिपक्व हो रहा ऋण चुकाने के लिए नए सिरे से धन जुटाना होगा और राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए नई प्रतिभूतियां जारी भी करनी होंगी। इसका अर्थ यह है कि आने वाले वर्षों में राज्य सरकारों से ऐसी खूब प्रतिभूतियां आती रहेगी,जिसका असर स्वाभाविक रूप से बाजार में ऋण की कुल लागत पर पड़ेगा।
हालांकि हाल के वर्षों में इन प्रतिभूतियों की परिपक्वता अवधि में कुछ सुधार हुआ है,लेकिन इनके निर्गम की मात्रा भी काफी अधिक रही है। मार्च 2020 के बाद से राज्य सरकारों की बकाया प्रतिभूतियों का आकार दोगुने से अधिक हो चुका है और इस अवधि में ये 14 प्रतिशत सालाना की चक्रवृद्धि दर से बढ़ी हैं। इसकी तुलना में केंद्र सरकार का ऋण इसी अवधि में सालाना 12 प्रतिशत ही बढ़ा है।
राज्यों के ऋण में तेज बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण उनका बढ़ता हुआ बजट घाटा हो सकता है। राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति पर जनवरी 2026 में आई भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक राज्यों की कुल बकाया देनदारियां वित्त वर्ष 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की 25.3 प्रतिशत थीं, जो 2025-26 के बजट अनुमान में बढ़कर 29.2 प्रतिशत तक पहुंच गई हैं। इस अनुपात को तेजी से कम करने की आवश्यकता है, जिसके लिए राजकोषीय घाटे में उल्लेखनीय कमी लानी होगी।
कुछ वर्षों तक राज्यों का कुल राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3 प्रतिशत से नीचे बना रहा था,लेकिन वित्त वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 3.3 प्रतिशत हो गया और वित्त वर्ष 2025-26 में भी इतना ही रहने का अनुमान जताया गया।
बजट घाटा कम करने के लिए राज्यों को अपना व्यय घटाना होगा और राजस्व बढ़ाना होगा। व्यय के मोर्चे पर अधिकतर लोग मानते हैं कि बिना शर्त नकद अंतरण की योजनाओं से सब्सिडी पर खर्च विशेष तौर पर तेजी से बढ़ रहा है। हाल में एक अध्ययन में बताया गया कि कुछ राज्यों में ऐसी योजनाओं से महिला लाभार्थियों को बहुत लाभ मिला है,लेकिन खजाने पर इन योजनाओं के प्रभावों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सोलहवें वित्त आयोग द्वारा 21 राज्यों पर किए गए अध्ययन के मुताबिक इन राज्यों में सब्सिडी का खर्च वित्त वर्ष 2018-19 में कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 2.2 प्रतिशत था, जो 2025-26 (बजट अनुमान) में बढ़कर 2.7 प्रतिशत हो गया। इस तरह कुल राजस्व व्यय का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा सब्सिडी पर खर्च हो रहा है।
राजस्व के मोर्चे पर राज्यों को अपनी आय बढ़ाने के उपाय करने होंगे। तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह आहलुवालिया की अध्यक्षता में एक राजस्व संवर्द्धन समिति गठित की है।इस समिति की सिफारिशों पर पूरे देश की नजर रहेगी,क्योंकि अन्य राज्य भी इनसे सीख ले सकते हैं। सोलहवें वित्त आयोग के आंकड़ों के मुताबिक राज्यों का अपना कर राजस्व पिछले लगभग एक दशक से जीडीपी के लगभग 6 प्रतिशत के आसपास ही ठहरा हुआ है।
वित्त वर्ष 2023-24 में यह 6.2 प्रतिशत था।कर संग्रह बढ़ने से राज्यों की वित्तीय स्थिति बेहतर हो सकती है।राज्यों के कर राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत राज्य वस्तु और सेवा कर है, जिसका योगदान लगभग 41 प्रतिशत है। इसलिए जीएसटी संग्रह में समग्र वृद्धि से राज्यों को भी सीधा लाभ होगा। इसके अतिरिक्त 11.4 प्रतिशत राजस्व स्टाम्प एवं पंजीकरण शुल्क से और लगभग 1 प्रतिशत भूमि राजस्व से प्राप्त होता है। इन दोनों मदों में संग्रह भी बढ़ाया जा सकता है।
कई राज्यों में स्टाम्प शुल्क की दरें इतनी अधिक हैं कि रियल एस्टेट सौदों में खरीदार और विक्रेता संपत्ति के वास्तविक मूल्य से काफी कम कीमत दिखाते हैं। इसलिए उचित स्टाम्प शुल्क तय कर और निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाकर राजस्व संग्रह बढ़ाया जा सकता है। राज्यों का कर के अलावा राजस्व भी लगभग एक दशक से जीडीपी के 1 प्रतिशत पर रुका है।
राज्यों के ऋण और राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण की आवश्यकता को और कितनी बार बताया जाए। सरकारों की उधारी की कुल जरूरत अगर पिछले कई वर्षों की तरह लंबे समय तक ऊंची बनी रहे तो बाजार में धन की लागत बढ़ जाती है। इसका प्रतिकूल प्रभाव निजी निवेश पर पड़ता है और आर्थिक वृद्धि की गति भी प्रभावित होती है।