जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की हुंकार,शिक्षाविदों का मिला समर्थन,शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग


जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की हुंकार,शिक्षाविदों का मिला समर्थन,शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग

मनोज बिसारिया | 24 Jun 2026

 

नई दिल्ली।राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में चल रहे नीट और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े आंदोलन के चौथे दिन मंगलवार को देश के शिक्षाविदों,विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने पहुंचकर अपना समर्थन दिया।आंदोलन स्थल पर वक्ताओं ने नीट परीक्षा प्रणाली,राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी और नई शिक्षा नीति 2020 को लेकर सवाल उठाए। वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था छात्रों पर अनावश्यक दबाव डाल रही है,इसमें व्यापक सुधार की जरूरत है।

लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम है शिक्षा

शिक्षाविद अनीता रामपाल ने कहा कि शिक्षा केवल पढ़ाई का माध्यम नहीं,बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। रामपाल ने कहा कि आजादी के बाद देश के नेताओं ने ऐसी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का सपना देखा था जो सभी बच्चों को बराबरी का अवसर दे।रामपाल ने कहा कि लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्थान शिक्षा है,अगर हमें वास्तव में बराबरी और भाईचारा स्थापित करना है तो सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा जरूरी है।शिक्षा ही वह स्थान है,जहां लोकतंत्र पनपता है और मजबूत होता है।

जंतर-मंतर पर सीजेपी को मिला शिक्षाविदों का समर्थन 

आंदोलन में शामिल छात्रों और अभिभावकों की सराहना करते हुए अनीता रामपाल ने कहा कि वे उन छात्रों के साथ खड़े हैं जो परीक्षा व्यवस्था की खामियों का सामना कर रहे हैं। रामपाल ने कहा कि मैं इसे पेपर लीक नहीं कहती,मैं इसे पेपर लूट कहती हूं,छात्रों और उनके परिवारों से जबरन पैसा वसूला जा रहा है और लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर लगाया जा रहा है।

नीट जैसी परीक्षा छात्रों की वास्तविक क्षमता नहीं मापती

अनीता रामपाल ने नीट परीक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि यह परीक्षा छात्रों की समझ,रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच को नहीं परखती। रामपाल ने कहा कि यह कोई वास्तविक इम्तिहान नहीं है।छात्र सिर्फ टिक-टिक करके जवाब भरकर आ जाते हैं,इससे न उनकी क्षमता का पता चलता है,न उनकी समझ का और न ही उनकी आलोचनात्मक सोच का।

अनीता रामपाल ने कोचिंग संस्कृति पर उठाया 

अनीता रामपाल ने कोचिंग संस्कृति पर भी सवाल उठाया। रामपाल ने कहा कि लाखों परिवार कर्ज लेकर बच्चों को कोचिंग दिलाते हैं,जबकि सफलता की संभावना बहुत कम होती है। रामपाल ने कहा कि हम नहीं चाहते कि लाखों छात्र कई-कई साल सिर्फ एक परीक्षा के लिए बर्बाद कर दें,घर की जमीन बिक जाए और परिवार कर्ज में डूब जाज। रामपाल ने छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाल के दिनों में कई छात्रों ने परीक्षा के दबाव में अपनी जान गंवाई है,जो पूरे शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।हम शिक्षक हैं चाहे छात्र कहीं का भी हों,वह हमारा छात्र है, उसकी सुरक्षा और भविष्य हमारी जिम्मेदारी है।

सालों पहले दी थी चेतावनी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के सचिव अविनाश कुमार ने कहा कि शिक्षकों ने कई साल पहले ही इस परीक्षा व्यवस्था के दुष्परिणामों को लेकर चेतावनी दी थी। कुमार ने कहा कि जब यह व्यवस्था विश्वविद्यालयों पर थोपी जा रही थी तब जेएनयू के 27 शिक्षक इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट गए थे,लेकिन हमारी बात नहीं सुनी गई,आज वही समस्याएं पूरे देश के सामने हैं।कुमार ने कहा कि वस्तुनिष्ठ और कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं का सबसे ज्यादा नुकसान गरीब,वंचित समुदायों,महिलाओं और छोटे शहरों से आने वाले छात्रों को हुआ है।कुमार ने कहा कि आज आप सड़कों पर हैं,क्योंकि इस व्यवस्था ने वंचित वर्गों के साथ अन्याय किया है, अगर शिक्षकों ने सात-आठ साल पहले चेतावनी दी थी तो हमें गर्व है कि हमने यह खतरा पहले ही देख लिया था।

सिर्फ मंत्री का इस्तीफा नहीं,व्यवस्था में बदलाव चाहिए

अविनाश कुमार ने कहा कि आंदोलन की मांग केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं होनी चाहिए।प्रधान जाएंगे तो कोई और आ जाएगा।असली जरूरत शिक्षा व्यवस्था में मूल सुधार की है।हमारी मांग है कि एनटीए को समाप्त किया जाए और शिक्षा व्यवस्था को छात्रों के हित में दोबारा तैयार किया जाए। कुमार ने कहा कि नई शिक्षा नीति को ऐसे समय लागू किया गया जब देश कोविड महामारी से जूझ रहा था और इस पर पर्याप्त लोकतांत्रिक चर्चा नहीं हुई।

आंदोलन को मिल रहा व्यापक समर्थन

बता दें कि सभा में मौजूद छात्रों,अभिभावकों और शिक्षकों ने आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया। वक्ताओं ने कहा कि यह सिर्फ छात्रों का आंदोलन नहीं बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था को बचाने की लड़ाई है,जब तक शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता,जवाबदेही और समान अवसर सुनिश्चित नहीं किए जाते, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।


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