रसोई गैस के संकट से फिर लौटा गांव-कस्बों में चूल्हों का दौर, याद आई मां की रसोई


रसोई गैस के संकट से फिर लौटा गांव-कस्बों में चूल्हों का दौर, याद आई मां की रसोई

धनंजय सिंह | 27 Mar 2026

 

आगरा।रसोई गैस का संकट और बढ़े दामों से गांव-कस्बों में घरों की रसोई में पुराने दिनों की याद आ गई है।अब पारंपरिक मिट्टी के चूल्हों पर खाना पक रहा है।धुएं वाली रसोई की वापस हो गई है। उत्तर प्रदेश के आगरा में पिनाहट के बीहड़ का गांव क्योरी बीच का पुरा हो या फिर जयपुर हाईवे पर नगला कुर्रा (महुअर)।रसोई गैस न मिलने से चूल्हों पर खाना पकाना मजबूरी बन गययी है।बाजार में इंडक्शन चूल्हे नहीं मिल रहे हैं।अब ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी और उपले ही एकमात्र सहारा हैं।घरों में पुराने दिनों की याद ताजा हो गयी है।एक दौर था जब घर-घर में लकड़ी और उपलों वाले मिट्टी के चूल्हे जलते थे।

ये हैं चूल्हे पर खाना पकाने के फायदे

मिट्टी के चूल्हे चिकनी मिट्टी,दोमट मिट्टी या तालाब के नीचे की गाद से बनाएं जाते हैं।मजबूती के लिए गेहूं,धान का भूसा,रेत और गोबर मिलाया जाता है।यह मिश्रण चूल्हे को उच्च ताप पर फटने से रोकता है और उसे टिकाऊ बनाता है।चिकनी मिट्टी पानी के साथ मिलकर अच्छी तरह बंधती है।

चूल्हे पर बन रहा है खाना 

पिनाहट का गांव क्योरी बीच का पुरा में शिवदास के घर पर अब चूल्हे पर खाना बन रहा है।शिवदास की पत्नी काजल देवी बताती हैं कि गैस किल्लत ने दिनचर्या को बदल दिया है।घर में गैस कनेक्शन हैं,लेकिन सिलेंडर नहीं मिल सका है।ब्लैक में घरेलू गैस सिलेंडर काफी महंगा मिल रहा था।अब वह सुबह जल्दी उठकर चूल्हा जलाने में जुट जाती हैं। पूरा परिवार इस दौरान साथ बैठकर खाना खा लेता है।

परिवार के लोग साथ खाते हैं खाना

किरावली का गांव नगला कुर्रा (महुअर) के शांति किसान हैं। शांति को सुबह खेत पर जाना पड़ता है।रसोई गैस की किल्लत ने परिवार में चूल्हा रसोई की वापसी कर दी है।लगातार लाइन में लगने के बावजूद सिलेंडर नहीं मिल रहा है।शांति की पत्नी शीतल बताती हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है,घर में मिट्टी का चूल्हा था,उस पर ही अब खाना पक रहा है। बहू पूजा भी साथ दे रही है। परिवार के सभी लोग एक साथ भोजन कर रहे हैं।

मां की रसोई की याद हुई ताजा

किरावली का गांव नगला कुर्रा (महुअर) के रवींद्र की पत्नी रजनी बताती हैं कि अब गैस किल्लत ने मां के समय के चूल्हे की याद दिला दी है।एक समय था जब मां चूल्हे पर रोटियां बनाती थीं और हम सब भाई-बहन पिताजी के साथ बैठकर खाना खाते थे,तब बड़ा आनंद आता था।अब गैस की कमी के चलते वही समय फिर लौटने लगा है। हालांकि मेहनत बढ़ गई है और धुआं भी झेलना पड़ रहा है।नाश्ते से लेकर खाना तक चूल्हे पर ही तैयार करना पड़ रहा है।गैस संकट ने पूरी दिनचर्या बदल दी है और शाम के भोजन की तैयारी भी पहले करनी पड़ रही है। इसके कारण घर के अन्य काम भी प्रभावित हो रहे हैं और समय का संतुलन बिगड़ गया है।


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